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चुनावी बॉण्ड पर न्यायालय का फैसला

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Court’s decision on electoral bonds

नयी दिल्ली: पूर्व मुख्य निर्वाचन आयुक्त (सीईसी) एस. वाई. कुरैशी ने बृहस्पतिवार को कहा कि चुनावी बॉण्ड योजना को रद्द करने वाला उच्चतम न्यायालय का फैसला ‘लोकतंत्र के लिए एक बड़ा वरदान’ है।

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को एक एतिहासिक फैसले में विवादास्पद चुनावी बॉन्ड को असंवैधानिक करार दिया। मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पांच-जजों की पीठ ने फैसला सुनाते हुए कहा कि किसी राजनीतिक दल को वित्तीय योगदान देने से बदले में उपकार करने की संभावना बन सकती है।

प्रमुख न्यायाधीश डी. वाई. चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पांच-सदस्यीय पीठ ने कहा कि चुनावी बॉण्ड योजना संविधान के तहत प्रदत्त सूचना के अधिकार और भाषण एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकारों का उल्लंघन करती है।

Court’s decision on electoral bonds की वैधता को चुनौती :-

सुप्रीम कोर्ट ने चुनावी बॉन्‍ड योजना की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर बृहस्पतिवार को अपना फैसला सुनाया. सुप्रीम कोर्ट ने चुनावी बॉन्‍ड योजना को रद्द कर दिया है। चुनावी बॉन्‍ड योजना को सुप्रीम कोर्ट द्वारा चुनावी साल में अंसवैधानिक करार देना, केंद्र सरकार को बड़ा झटका है। कोर्ट ने कहा, ‘काले धन पर अंकुश लगाने के उद्देश्य से सूचना के अधिकार का उल्लंघन उचित नहीं है।

चुनावी बांड योजना सूचना के अधिकार और अभिव्यक्ति की आजादी का उल्लंघन है। राजनीतिक दलों के द्वारा फंडिंग की जानकारी उजागर न करना उद्देश्य के विपरीत है।’ प्रधान न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने पिछले साल दो नवंबर को मामले में अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था.

सुप्रीम कोर्ट ने क्यों रद्द किया बॉन्ड?

पांच जजों की पीठ ने कहा कि राजनीतिक दलों को गुमनाम चंदे वाली चुनावी बॉन्ड योजना संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ए) के तहत प्रदत्त मतदाताओं के सूचना के अधिकार का उल्लंघन करती है।

Court’s decision on electoral bonds :- चुनावी बॉन्ड योजना की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर फैसला सुनाते हुए सीजेआई चंद्रचूड़ ने कहा, “इस बात की भी वैध संभावना है कि किसी राजनीतिक दल को वित्तीय योगदान देने से धन और राजनीति के बीच बंद संबंध के कारण प्रति-उपकार की व्यवस्था हो जाएगी। यह नीति में बदलाव लाने या सत्ता में राजनीतिक दल को वित्तीय योगदान देने वाले व्यक्ति को लाइसेंस देने के रूप में हो सकती है।

यह कहते हुए कि राजनीतिक चंदा योगदानकर्ता को मेज पर एक जगह देता है। यानी यह विधायकों तक पहुंच बढ़ाता है और यह पहुंच नीति निर्माण पर प्रभाव में भी तब्दील हो जाती है।

Court’s decision on electoral bonds :- सीजेआई चंद्रचूड़ ने कहा कि राजनीतिक दलों की फंडिंग की जानकारी मतदान का विकल्प के प्रभावी अभ्यास के लिए आवश्यक है। “राजनीतिक असमानता में योगदान देने वाले कारकों में से एक, आर्थिक असमानता के कारण व्यक्तियों की राजनीतिक निर्णयों को प्रभावित करने की क्षमता में अंतर है।

उन्होंने कहा, ‘आर्थिक असमानता के कारण धन और राजनीति के बीच गहरे संबंध के कारण राजनीतिक जुड़ाव के स्तर में गिरावट आती है।’

चुनावी बॉन्ड योजना को अदालत चुनौती क्यों मिली?

दो गैर-सरकारी संगठनों एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) और कॉमन कॉज और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) ने चुनावी बॉन्ड योजना को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं दायर की थीं। याचिकाकर्ताओं ने दावा किया कि इस योजना से राजनीतिक फंडिंग में गैर-पारदर्शिता की अनुमति दी गई और बड़े पैमाने पर चुनावी भ्रष्टाचार को वैध बनाया गया।

Court's decision on electoral bonds

चुनावी बॉन्ड को कौन खरीद सकता है?

Court’s decision on electoral bonds :- चुनावी बॉन्ड को भारत में कोई भी व्यक्तियों या कंपनी खरीद सकती है। भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) की देशभर में फैली 29 शाखाओं को चुनावी बॉन्ड बेचने के लिए अधिकृत किया गया है। चुनावी बॉन्ड को प्रत्येक वर्ष जनवरी, अप्रैल, जुलाई और अक्टूबर में 10 दिनों के लिए बेचा जाता है। खरीदार की पहचान एसबीआई को छोड़कर सभी के लिए गुमनाम रहती है।

बॉन्ड विशेष रूप से राजनीतिक दलों को धन के योगदान के लिए जारी किए जाते हैं। ये बॉन्ड एसबीआई द्वारा जारी किए जाते हैं और कम से कम 1,000 रुपये में बेचे जाते हैं जबकि अधिकतम सीमा नहीं है। इस योजना के तहत कॉर्पाेरेट और यहां तक कि विदेशी संस्थाओं द्वारा दिए गए दान पर 100 प्रतिशत कर छूट मिलती है।

दान कैसे किया जाता है?

किसी राजनीतिक दल को दान देने के लिए केवाईसी-कम्प्लेंट अकाउंट के जरिए बॉन्ड खरीदे जा सकते हैं। राजनीतिक दलों को बॉन्ड प्राप्त होने के 15 दिन के भीतर उसे भुनाना होता है। कोई भी व्यक्ति या कंपनी कितने चुनावी बॉन्ड खरीद सकती है, इसकी संख्या तय नहीं है।

Court’s decision on electoral bonds :- अदालत ने कहा, ‘स्टेट बैंक को चुनावी बॉन्डों के जरिये दिए गए चंदे का विवरण देना होगा और चंदा हासिल करने वाली राजनीतिक पार्टियों का ब्योरा भी देना होगा।’ अदालत ने आदेश दिया कि भारतीय स्टेट बैंक आगे चुनावी बॉन्ड जारी नहीं करेगा और 12 अप्रैल, 2019 से अभी तक खरीदे गए चुनावी बॉन्ड का ब्योरा निर्वाचन आयोग को देगा।

शीर्ष अदालत ने 12 अप्रैल, 2019 को अंतरिम आदेश जारी किया था, जिसमें अभी तक खरीदे गए चुनावी बॉन्ड की पूरी जानकारी सीलबंद लिफाफे में निर्वाचन आयोग को सौंपने का निर्देश दिया गया था। इसमें प्रत्येक बॉन्ड खरीदे जाने की तारीख, बॉन्ड खरीदार का नाम और बॉन्ड की कीमत शामिल है।

अदालत ने कहा, ‘अ​धिनियम में संशोधन से पहले घाटे वाली कंपनियां चंदा देने में समर्थ नहीं थीं। संशोधन में इस बात का ध्यान नहीं रखा गया है कि घाटे में चल रही कंपनियां किसी फायदे के बदले चंदा दें तो उसका क्या नुकसान होता है। कंपनी अ​धिनियम की धारा 182 में संशोधन मनमानी भरा है क्योंकि इसमें घाटे और मुनाफे वाली कंपनियों के बीच फर्क नहीं किया गया है।’

संशोधन के जरिये कंपनियों से चंदे की तय सीमा खत्म कर दी गई। पहले कंपनी अपने शुद्ध मुनाफे का अधिकतम 7.5 फीसदी हिस्सा ही राजनीतिक पार्टियों को चंदे में दे सकती थी। शीर्ष अदालत ने यह सीमा खत्म करने वाला संशोधन भी रद्द कर दिया। अदालत ने भारतीय स्टेट बैंक को ये बॉन्ड जारी करने से भी रोक दिया।

 

 

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