Spiritual message
भारत की संस्कृति में त्योहार केवल हर्षोल्लास का माध्यम नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला और मूल्यों को आत्मसात करने का अवसर भी होते हैं। इन्हीं पर्वों में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का विशेष महत्व है। यह केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि आत्मिक चेतना को जगाने वाला संदेश भी देता है। श्रीकृष्ण का जन्म हर युग में अधर्म, अत्याचार और पाप के नाश का प्रतीक माना गया है।
जन्म से ही दिव्यता का प्रमाण
महापुरुषों और नेताओं की जयंतियां उनके कर्मों की स्मृति के रूप में मनाई जाती हैं। लेकिन श्रीकृष्ण की विशेषता यह है कि वे जन्म से ही पूजनीय और दिव्य माने गये। उनकी माता देवकी ने जन्म के क्षण में ही विष्णु के चतुर्भुज स्वरूप का साक्षात्कार किया। शैशवावस्था से ही उनकी छवि अलौकिक रही – सिर पर मोरपंख, शरीर पर रत्नजड़ित आभूषण और चारों ओर प्रभामंडल। यही कारण है कि श्रीकृष्ण जन्माष्टमी अनुपमेय पर्व बन गया।
आज के समय में संदेश
आज जब संसार में भौतिकता, लोभ, हिंसा और स्वार्थ की प्रधानता है, तब कृष्ण जन्माष्टमी हमें स्मरण कराती है कि यह उत्सव केवल दीप जलाने या झूला सजाने भर का नहीं है, बल्कि उनके जीवन के आदर्शों को आत्मसात करने का संकल्प है। श्रीकृष्ण ने गीता में अर्जुन को कर्म, भक्ति और ज्ञान का मार्ग दिखाया। यही मार्ग आज भी हर व्यक्ति के लिए प्रासंगिक है।
16 कला सम्पन्न श्रीकृष्ण
भारतीय परंपरा में “सोलह कला सम्पन्न” पूर्णता का प्रतीक है। श्रीकृष्ण का व्यक्तित्व शारीरिक सौंदर्य, आत्मिक बल, दिव्यता और अद्भुत आकर्षण का संगम था। उनका प्रभाव इतना गहन था कि आज भी लोग उनके जीवन से प्रभावित होकर आदर्श स्थापित करते हैं।
गीता का शाश्वत ज्ञान
महाभारत युद्ध में अर्जुन जब मोह और शोक से भर गया, तब श्रीकृष्ण ने उसे गीता का ज्ञान दिया। यह केवल अर्जुन के लिए नहीं, बल्कि सम्पूर्ण मानवता के लिए मार्गदर्शन है।
आत्मा अमर है, शरीर नश्वर है।
काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार ही मनुष्य के शत्रु हैं।
निष्काम कर्म ही जीवन का सर्वोच्च मार्ग है।
यदि प्रत्येक व्यक्ति अर्जुन बनकर गीता के उपदेशों को आत्मसात करे तो उसके भीतर चल रहा “महाभारत” समाप्त हो सकता है।
श्रीकृष्ण की महानता का रहस्य
यद्यपि वे जन्म से ही दिव्य थे, फिर भी यह मान्यता है कि उन्होंने अपने पूर्व जन्मों में योगाभ्यास और गहन साधना की होगी। तभी वे श्रीनारायण पद को प्राप्त कर सके। यही हमें यह प्रेरणा देता है कि कोई भी मनुष्य सतत पुरुषार्थ और साधना द्वारा अपने जीवन को ऊँचाइयों तक पहुँचा सकता है।
जन्माष्टमी का वास्तविक आह्वान
आज लोग मंदिर सजाते हैं, झाँकियाँ बनाते हैं और भक्ति-गीत गाते हैं। लेकिन श्रीकृष्ण का वास्तविक आह्वान तभी सफल होगा जब हम अपने हृदय को मंदिर बना सकें। जब तक मन काम, क्रोध, लोभ और अहंकार से ग्रसित है, तब तक उसमें श्रीकृष्ण का आगमन नहीं हो सकता।
बाहर की बिजली से अधिक आवश्यक है आत्मा रूपी दीपक को प्रज्वलित करना।
पूजा-अर्चना के साथ-साथ आचरण की पवित्रता भी अनिवार्य है।
ज्ञान-यज्ञ की प्रेरणा
भागवत और गीता हमें यह सिखाते हैं कि सबसे श्रेष्ठ यज्ञ है “ज्ञान-यज्ञ”। श्रीकृष्ण ने स्वयं जीवन को दूसरों के उत्थान में समर्पित किया। यही कारण था कि उन्होंने पांडवों का साथ देकर धर्म की स्थापना की और कौरवों के रूप में अन्याय व अधर्म का अंत किया।
आधुनिक परिप्रेक्ष्य में महाभारत
महाभारत केवल एक युद्ध की कथा नहीं है, बल्कि यह प्रत्येक घर की कहानी है। आज भी परिवारों में विवाद, ईर्ष्या, लालच और मतभेद के रूप में छोटे-छोटे “कौरव-पांडव” मौजूद हैं। श्रीकृष्ण का संदेश है कि जब तक हम आंतरिक विकारों को नहीं हराएँगे, तब तक बाहरी शांति असंभव है।
आध्यात्मिक दृष्टि
श्रीकृष्ण कहते हैं कि जीवन एक खेल की तरह है। इसमें अदृश्य शत्रु – वासनाएँ, क्रोध, अहंकार – से युद्ध करना ही सच्चा पराक्रम है। पूतना, बकासुर, कालिया नाग आदि राक्षस वास्तव में इन्हीं विकारों के प्रतीक हैं। गोपियों का प्रेम ईश्वर के प्रति निश्छल भक्ति का प्रतीक है। गीता का यही संदेश है कि आत्मिक शुद्धि के बिना सच्चा सुख संभव नहीं।
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की सार्थकता
आज की जन्माष्टमी हमें स्मरण कराती है कि:
हर व्यक्ति अपने भीतर छिपे कौरवों से लड़े।
जीवन को गीता के ज्ञान से आलोकित करे।
भक्ति केवल गीत और झाँकी तक सीमित न रहकर जीवन के संस्कारों में उतरे।