साहित्य

‘उल्टन्त’ गढ़वाली व्यंग्यात्मक कविता

उल्टन्त
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उल्टन्त

हर्षिता टाइम्स।
लेखक संदीप रावत, श्रीनगर गढ़वाल, विद्यालय के छात्र -छात्राओं को अपनी मातृभाषा एवं लोक संस्कृति से जोड़ने हेतु प्रयासरत हैं। स्कूली बच्चों को गढ़वाली लेखन एवं गढ़वाली पढ़ने हेतु प्रेरित कर रहे हैं

गढ़वाली व्यंग्यात्मक कविता ‘उल्टन्त’ :-

गंडेळों का सिंग पैना ह्वेगैनि
जोंकूं का हडगा कटगड़ा ह्वेगैनि
किताळों कि बैकबून मजबूत ह्वेगे
अर! मच्छरों का टंगड़ा सीधा ह्वेगैनि ।

किरम्वळा अब तड़ाक नि देंदा, डंक मन्ना
सरैल मा जहर कि मिसाइल छवड़णा
उप्पनोंन बि अब तड़काणु छोड़ियालि
तौं पर अब डी डी टी, निआन असर नि कन्ना।

संगुळा अर झौड़ा बज्रबाण बण्यां
न्योला अर गुरौ अब दगड़्या बण्यां
बिरौळै बरात मा मूसा ब्रेकडांस कन्ना
अर! चौंर्या स्याळ बाघ ना, शेर बण्यां।

भौंरा-मिरासि फूलों मा जहर छवळणा
उल्लू अब दिन मा द्यखणा
हंस, काणा अर गरुड्या चाल हिटणा
घूण, अन्न का बदला मनखि तैं घुळणा।

होंदा -खांदा गौं मा घेंदुड़ा पधान बण्यां
जोंक अब ल्वे ना, ईमान तैं चुसणा
बिरौळा अब श्खौ बाघश् बणिगैनि
अर! कुकुरों कि दौड़ मा भ्वट्या शेर बण्यां।

संदीप रावत (शिक्षक गढ़वाली लेखक, शिक्षक )परिचय :-

प्रवक्ता(रासायन विज्ञान ) रा. इ. कॉ. धद्दी घंडियाल, बड़ियारगढ़, टिहरी गढ़वाल,उत्तराखण्ड।
ग्राम- अलखेतु, पोस्ट -बगड़ी, पोखड़ा, पौड़ी गढ़वाल।
वर्तमान निवास – न्यू डांग,श्रीनगर गढ़वाल।

‘हित्य सृजन एवं प्रकाशन,

बचपन से ही गढ़वाली गीत – लोक संगीत व गढ़वाली लेखन में रुचि रही है। गढ़वाली गीत, गढ़वाली कविताएं, गढ़वाली कथाएं एवं शोधपरक लेखन में विशेष रुचि है।

कई वर्षों से पत्र – पत्रिकाओं में सैकड़ों गढ़वाली – हिंदी आलेख एवं कविता, गीत, कथाएं प्रकाशित हैं।

गढ़वाली गद्य व गढ़वाली पद्य लेखन में निरंतरता बनी हुई है । लेखक की अब तक पांच गढ़वाली पुस्तकें प्रकाशित हैं एवं एक गढ़वाली पुस्तक का सम्पादन किया है।

1-एक लपाग ( गढ़वाली कविता-गीत संग्रह-सन् 2013 में समय साक्ष्य,देहरादून से प्रकाशित ),

2-गढ़वाळि भाषा अर साहित्य कि विकास जात्रा (संदर्भ एवं गढ़वाली भाषा -साहित्य के ऐतिहासिक विकास क्रम सम्बन्धी शोधपरक गढ़वाली गद्य की यह पुस्तक सन् 2014 में विंसर पब्लिकेशन देहरादून से प्रकाशित है।)
यह पुस्तक गढ़वाली भाषा -साहित्य के इतिहास पर गढ़वाली भाषा में लिखी गई पहली पुस्तक है। इससे पहले गढ़वाली भाषा और इसके सम्पूर्ण साहित्य पर जो पुस्तकें पूर्व में लिखी गईं वो सभी हिंदी में हैं।

3-लोक का बाना (गढ़वाली आलेख संग्रह – सन् 2016में समय साक्ष्य,देहरादून से प्रकाशित है।)

4-उदरोळ ( गढ़वाली कथा संग्रह जो 2017 में उत्कर्ष प्रकाशन मेरठ से प्रकाशित है।) ,

5-तू हिटदि जा (गढ़वाली गीत संग्रह-सन् 2019 में
रावत डिजिटल, गाजियाबाद से प्रकाशित है। )

6-सम्पादन – 89 गढ़ कवयित्रियों के पहले वृहद गढ़वाली कविता संग्रह श्आखर श्(दिसा -धियाण्यूँ को पैलो वृहद गढ़वाळि कविता संग्रै) का संपादन किया है जो सन् 2020 में रावत डिजिटल, गाजियाबाद से प्रकाशित है ।

गतिविधियां –

(1) लेखक गढ़वाली भाषा एवं साहित्य को समर्पित श्आखर चौरिटेबल ट्रस्ट (श्रीनगर गढ़वाल )श् के संस्थापक एवं अध्यक्ष हैं और गढ़वाली भाषा -साहित्य सम्बन्धी एवं शैक्षणिक विभिन्न कार्यक्रमों एवं सम्मान समारोहों का आयोजन करते हैं ।

(2) लेखक द्वारा विभिन्न मंचों,आकाशवाणी, दूरदर्शन आदि में काव्य पाठ के साथ ही गढ़वाली भाषा एवं लोक संस्कृति सम्बन्धी साहित्यिक एवं सामाजिक गतिविधियों में सक्रिय हैं।

लेखक द्वारा स्कूली शिक्षा में नवाचार–

(1)गढ़वाल के कई विद्यालयों की प्रार्थना सभा में काफी पहले से लेखक,शिक्षक द्वारा रचित एवं स्वयं उनके द्वारा धुन सहित तैयार की दो गढ़वाली सरस्वती वंदनाएं हो रही हैं ।

1- तेरु शुभाशीष।
2- द्वी आखरों कु ज्ञान दे।
3.डायट टिहरी द्वारा भी लेखक द्वारा लिखित श्तेरु शुभाशीष श् को संगीत के साथ तैयार किया गया। यह गढ़वाली वंदना गढ़वाल के साथ -साथ कुमाऊँ के कई विद्यालयों की प्रार्थना सभा में हो रही है।
4. डायट टिहरी द्वारा ही तैयार की गई चर्चित श्नमो भगवती माँ सरस्वती श् गढ़वाली वंदना की धुन (कंपोजीशन )भी इन्हीं के द्वारा तैयार की गई।

https://www.bookganga.com/ebooks/Books/details/5116753557736091234?BookName=Kya%20kahun?%20Kaise%20Kahun?

 

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