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सांस्कृतिक धरोहर को सजोये नक्षत्र वेधशाला में हुआ हेरिटेज टूर गाइड प्रशिक्षण

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सांस्कृतिक धरोहर को सजोये

हर्षिता टाइम्स।
देवप्रयाग। सन् 1946 में शोधार्थियों और खगोलशास्त्र के जिज्ञासुओं के लिए आचार्य चक्रधर जोशी द्वारा दिव्य तीर्थ देवप्रयाग में स्थापित नक्षत्र वेधशाला में हेरिटेज टूर गाइड के प्रशिक्षुओं ने भ्रमण किया।

अपर निदेशक, पर्यटन विभाग पूनम चंद के दिशानिर्देशन में टूरिज्म एंड हास्पिटेलिटी स्किल काउंसिल (टीएचएससी) के माध्यम से देवप्रयाग में सैलानियों को आकर्षित करने के लिए स्थानीय स्तर पर हेरिटेज टूर गाइड तैयार किए जा रहे है।

इस प्रशिक्षण की अवधि 10 दिन है जिसमे ओंकारानंद सरस्वती राजकीय डिग्री कॉलेज, देवप्रयाग के प्रोफेसर डॉ. एम एन नौडियाल, डॉ सृजना राणा, नक्षत्र वेदशाला के डॉ प्रभाकर जोशी एवं अन्य क्षेत्र के विशिष्ट व्यक्तियों द्वारा प्रशिक्षण दिया जा रहा है।

पर्यटन विभाग के ट्रेनिंग पार्टनर समर्पित मीडिया सोसाइटी द्वारा प्रशिक्षुओं को हेरिटेज टूरिज्म और हेरिटेज टूर गाइड की प्रस्तुति, व्यवहार, संचार, उत्तराखंड विरासत स्थल के रूप में तथा सतत और जिम्मेदार पर्यटन आदि विभिन्न पक्षों पर प्रशिक्षण दिया जा रहा है । इसी कड़ी में प्रशिक्षुओं को प्रसिद्ध हेरिटेज साइट नक्षत्र वेधशाला का भ्रमण कराया गया।

सांस्कृतिक धरोहर को सजोये
सांस्कृतिक धरोहर को सजोये नक्षत्र वेधशाला

सांस्कृतिक धरोहर को सजोये प्रशिक्षुओं को वेधशाला के बारे में विस्तृत जानकारी दी :-

वेधशाला में प्रशिक्षुओं में जर्मन टेलीस्कोप, जलघटी, सूर्यघटी, धूर्वघटी, बैरोमीटर, सोलर सिस्टम, राशि बोध, नक्षत्र मंडल चार्ट, दूरबीनें आदि समेत कई हस्तलिखित ग्रन्थ, भोज पत्र, ताड़ पत्र और दर्शन, संस्कृति, विज्ञान, ज्योतिष से सम्बंधित अनेक प्रकार का साहित्य को बहुत करीब से देखा। आचार्य के सुपुत्र डा. प्रभाकर जोशी जी ने सभी प्रशिक्षुओं को वेधशाला के बारे में विस्तृत जानकारी दी।

डॉ प्रभाकर ने सौरमंडल के कई दुर्लभ माडल, लगभग दो शताब्दी पूर्व की सूर्यघटी, चन्द्रघटी, जलघटी, द्वादश अंगुल छाया गणित यंत्र, दुर्लभ खनिज, टिहरी रियासत का तत्कालीन मानचित्र, 1946 का डा. होमी मेहता, अहमदाबाद द्वारा परिचालित संसद भवन चित्रित कलेण्डर, मैथलीशरण गुप्त का 1936 का दुर्लभ फोटोग्राफ, 1914 में कलकत्ता से प्रकाशित नागेन्द्र नाथ बसु द्वारा संपादित 24 खण्डों का हिंदी विश्वकोश, महात्मा गांधी सर्म्पूण वाग्मय तथा कई प्राचीन पुस्तकें, यूं आचार्य की संग्रहित बौद्धिक संपदा के हर एक कवच-कुंडल को विस्तारपूर्वक दिखाकर बताया।

खगोलीय घटनाओं की जानकारी के लिए एक 6 इंची लैंस से युक्त 1930 में निर्मित भारी भरकम जर्मन दूरबीन आज भी सुचारू रूप से कार्य कर रही है। साथ ही इंग्लैंड, जापान, ब्राजील से आयातित अन्य छोटी-बड़ी दूरबीनें भी संरक्षित हैं। ये सभी दूरबीनें कई अद्भुत खगोलीय घटनाओं की साक्षी रही हैं।

इसी ज्ञान-बगीचे में सन् 1620 में लुधियाना से प्राप्त ‘वास्तुशिरोमणी’, प्राचीन भृगुसंहिता के कई खंड, कांची कामकोटी शंकराचार्य के एक हजार वर्ष प्राचीन ताड़ पत्रिक ग्रंथ सहित संस्कृत, हिंदी, गुरूमुखी, उर्दू, तेलगू इत्यादि भाषाओं के लगभग 20000 ग्रंथ तथा ज्योतिष, वास्तुशास्त्र, तंत्र मंत्र की लभगभ 3000 पांडुलिपियां सुव्यवस्थित रखी गई हैं।

डा. प्रभाकर जोशी जैसे स्वनामधन्य महापुरूषों की उस अगली पीढ़ी से हैं जो पिछली पीढ़ी की सृजित अमूल्य नीधि को संरक्षित करना अपना युगधर्म समझती है। अन्यथा अधिकांश महापुरूषों की सृजन कड़ियां अगली पीढ़ी की घोर लापरवाही के कारण टूटती ही रही हैं।

एक प्रशिक्षक के रूप में उनके द्वारा बताई गयी जानकारी से हेरिटेज टूर गाइड के प्रशिक्षणार्थी बहुत लम्भान्वित हुए। प्रशिक्षण के बाद प्रभाकर जोशी जी ने प्रशिक्षुओं को निःशुल्क किताबें वितरित करी

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